वॉशिंगटन/तेहरान: मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन ईरान के सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए हैं। इन हमलों के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है। इस घटनाक्रम ने हाल ही में शुरू हुई शांति प्रक्रिया और युद्धविराम की संभावनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आशंका है कि यदि दोनों पक्ष पीछे नहीं हटे, तो यह टकराव पूरे क्षेत्र को व्यापक युद्ध की ओर धकेल सकता है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, दूसरे चरण में लगभग 90 सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया गया। इन हमलों में तटीय रडार, वायु रक्षा प्रणाली, मिसाइल और ड्रोन भंडारण केंद्र, नौसैनिक क्षमताएं तथा सैन्य ढांचे को लक्ष्य बनाया गया। अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई होरमुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई है और इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
दूसरी ओर, ईरान ने अमेरिका के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिकी हमले पहले हुए समझौते और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की भावना के विरुद्ध हैं। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उसने बहरीन और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों पर जवाबी हमले किए हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सभी मामलों में नहीं हो सकी है, इसलिए इन्हें दोनों पक्षों के आधिकारिक दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शांति प्रक्रिया पर पड़ा असर है। जून में हुए अंतरिम समझौते (MoU) के तहत दोनों देशों ने सीमित अवधि के लिए सैन्य गतिविधियां रोकने और वार्ता जारी रखने पर सहमति बनाई थी। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से संकेत दिया है कि यह समझौता "लगभग समाप्त" हो चुका है, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वार्ताकार बातचीत जारी रख सकते हैं। यही विरोधाभास मौजूदा स्थिति को और अधिक अनिश्चित बनाता है।
पत्रकारिता के दृष्टिकोण से देखें तो इस पूरे घटनाक्रम में कई दावे ऐसे हैं जिनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है। अमेरिका अपने हमलों को आत्मरक्षा और समुद्री सुरक्षा की कार्रवाई बता रहा है, जबकि ईरान इन्हें समझौते का उल्लंघन और आक्रामक सैन्य कार्रवाई बता रहा है। दोनों देशों की ओर से जारी आंकड़ों और सैन्य सफलता के दावों की पुष्टि किसी निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय एजेंसी द्वारा नहीं की गई है। ऐसे में किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।
इस संघर्ष का असर केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है। होरमुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई है और वैश्विक निवेशकों की चिंता भी बढ़ी है। यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो इसका असर ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच विश्वास का संकट और गहरा हो गया है। लगातार सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों ने शांति वार्ता को कमजोर किया है, लेकिन कूटनीतिक रास्ता पूरी तरह बंद हुआ है, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों देश तनाव कम करने की दिशा में बढ़ते हैं या फिर मध्य पूर्व एक और बड़े संघर्ष का सामना करेगा। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सैन्य शक्ति के प्रदर्शन के बीच संवाद की संभावनाएं पूरी तरह समाप्त न होने पाएं।

0 टिप्पणियाँ
Thank You Jantamat News Hindi